धान पर नमी के नाम पर ‘काट’ का खेल कब होगा बंद? किसानों को पूरी फसल का उचित मूल्य मिलने पर सवाल

कृषि मंत्री श्याम सिंह राणा के सामने उठा था मामला, प्रथा बंद करने के दिए थे निर्देश; अब कार्रवाई का इंतजार

संपादक रितेश गर्ग (कालांवाली):- धान की सरकारी खरीद के दौरान नमी के नाम पर किसानों की फसल में कटौती किए जाने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। किसानों को उम्मीद रहती है कि सरकारी खरीद व्यवस्था के तहत उनकी फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीदी जाएगी, लेकिन मंडियों में नमी और गुणवत्ता के नाम पर होने वाली कथित कटौती से किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि धान खरीद में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और किसानों को उनकी उपज का पूरा मूल्य दिलाने के लिए ठोस कार्रवाई कब होगी? 

इस मामले को कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्याम सिंह राणा के समक्ष भी उठाया गया था। मंत्री की ओर से नमी के नाम पर कटौती की प्रथा बंद करने के निर्देश दिए जाने की बात सामने आई थी। इसके बावजूद मंडियों में व्यवस्था में कितना सुधार हुआ है और संबंधित विभागों ने निर्देशों पर क्या कार्रवाई की है, यह स्पष्ट होना बाकी है।

नमी के नाम पर कटौती पर उठ रहे सवाल

किसानों का कहना है कि धान की गुणवत्ता और नमी की जांच निर्धारित मानकों के अनुसार होनी चाहिए। यदि किसी किसान की फसल में निर्धारित सीमा से अधिक नमी पाई जाती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन नमी के नाम पर मनमाने ढंग से कटौती या अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना किसानों के हित में नहीं है। किसानों को आशंका है कि ऐसी व्यवस्था से उनकी मेहनत की कमाई प्रभावित होती है।

खाली और भरी ट्रॉली के रिवाज पर भी सवाल

मंडी में धान की खरीद के दौरान खाली और भरी ट्रॉली के नाम पर होने वाली कथित कटौती भी चर्चा का विषय है। सवाल यह है कि क्या इस व्यवस्था को समाप्त करने के लिए संबंधित विभागों और खरीद एजेंसियों ने कोई ठोस कदम उठाया है? यदि मंत्री स्तर पर निर्देश जारी हुए थे, तो उनके पालन की निगरानी कौन कर रहा है और किसानों की शिकायतों का समाधान किस स्तर पर किया जा रहा है?

पारदर्शी खरीद व्यवस्था की मांग

किसानों के हित में जरूरी है कि मंडियों में नमी की जांच पारदर्शी तरीके से हो, गुणवत्ता संबंधी मानकों का समान रूप से पालन किया जाए और खरीद प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की अनियमितता की शिकायत मिलने पर निष्पक्ष जांच हो। साथ ही, किसानों को कटौती के नियमों और भुगतान की प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि उन्हें अपनी फसल का उचित मूल्य मिल सके।

अब निगाहें कृषि विभाग, मार्केट कमेटी और संबंधित खरीद एजेंसियों की कार्रवाई पर टिकी हैं। किसानों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि नमी और अन्य कारणों के नाम पर होने वाली कथित कटौती पर प्रभावी रोक लगेगी या उन्हें इस बार भी अपनी फसल का पूरा मूल्य पाने के लिए परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।